विश्वनाथ प्रताप सिंह का जीवन परिचय

राजीव गांधी सरकार के पतन के बाद आम चुनाव में जनता दल को बहुमत प्राप्त हुआ। 2 दिसम्बर 1989 को विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत गणराज्य के आठवें प्रधानमंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप अपनी ईमानदारी और दिलतों पिछडों, ​वंचित समुदाय के प्रति अपने दिल में करूणा के लिये जाने जाते हैं।

विश्वनाथ प्रताप सिंह का जीवन परिचय

वीपी सिंह का पूरा नाम विश्वनाथ प्रताप सिंह था। इनका जन्म 25 ​जून 1931 को इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता राजा भगवती सिंह प्रसाद एक जमींदार थे। वीपी सिंह जब 5 साल के थे तब 1936 में उन्हें मांडवा के राजा बहादुर राय गोपाल सिंह ने गोद ले लिया। तब से वे राजपरिवार में ही रहे। सन 1941 में राजा बहादुर राय गोपाल सिंह की मृत्यु के बाद वीपी सिंह को माण्डवा का 41 में राजा बनाया गया। इनका विवाह 25 जून 1955 को सीता कुमारी के साथ सम्पन्न हुआ।

वीपी सिंह की प्राथमिक शिक्षा देहरादून के कैंब्रिज स्कूल से हुई इसके बाद वे आगे की पढाई पूरी करनें इलाहाबाद चले गये फिर पुणे युनिवर्सिटी से पढाई की। इस समय उनका रूझान छात्र राजनीति की तरफ बढा और 1947—1948 में वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे और इलाहाबाद विश्वविद्यायल छात्र संघ के उपाध्यक्ष भी रहे। वीपी सिंह के अन्दर देशप्रेम उमडने लगा और 1957 में उन्होने अपनी सारी सम्पत्ति भूदान में दान कर दी। जिसके कारण इनके परिवार वालों ने इनसे रिश्ता तोड लिया। वह इलाहाबाद की अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिशासी प्रकोष्ठ के सदस्य भी रहे।

वीपी सिंह समृध्द परिवार से थे जिसके कारण युवाकाल की राजनीति में उन्हे सफलता प्राप्त हुई। 1969 में वह उत्तर प्रदेश की विधान सभा पहुॅचे और सन 1980 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें इनका कार्यकाल 1982 तक रहा। 29 जनवरी 1983 को वह केन्द्रीय वणिजय मंत्री बनें। 31 दिसम्बर 1984 को राजीव गांधी की कैबिनेट में भारत के वित्तमंत्री बनें। विश्वनाथ प्रताप सिंह को सूचना मिली कि कई भारतीयों द्वारा विदेशों की बैंको में कालाधन जमा करवाया गया है। जिसके जॉच के लिये वीपी सिंह ने अमेरिका की एक जासूस संस्था फेयरफैक्स की नियुक्ति कर दी जिससे उन भारतीयों के नाम का पता लगाया जा सके। इसके अलावा बोफोर्स कांण्ड में जब राजीव गांधी का नाम आया तो वी​पी सिंह ने संसद में आवाज उठाई। विपक्ष बोफोर्स कांण्ड को चुनावी मुद्दा बना चुका था। पूरे देश में माहौल बन गया कि बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी भी शामिल हैं। इससे राजीव गांधी और वीपी सिंह मे टकराव हो गया और राजीव गांधी ने वीपी सिंह को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया।

इसके साथ ही भारत में आम चुनाव नजदीक आ गये और चुनावी सभाओं में वीपी सिंह ने बोफोर्स मुद्दे को खूब उछाला। चूंकि वीपी सिंह की छवि ईमानदार नेता के रूप में थी और वे सरकार में मंत्री रहे थे इसलिये लोगों ने उनकी बात का विश्वास किया। वीपी सिंह चुनावी दावों में कहते थे कि वे बोफोर्स घोटाले की जांच कराऐंगे। वीपी सिंह ने आरिफ मुहम्मद, विद्याचरण शुक्ल, रामधन तथा सतपाल मलिक और अन्य असंतुष्ट कांग्रेसियों के साथ मिलकर 2 अक्टूबर 1987 को अपना एक पृथक मोर्चा गठित कर लिया। इस मोर्चे में भारतीय जनता पार्टी, वामदलों सहित सात दल शामिल हो गये और 11 अक्टूबर 1988 को राष्ट्रीय मोर्चा का गठन कर लिया गया।

1989 में हुये आम चुनावों में कांग्रेस की हार हुई। उसे केवल 197 सींटे मिलें। वीपी सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सींटे मिलीं। भाजपा को 86 और वामदलों को 52 सीटें मिलें। भाजपा और वामदलों ने राष्ट्रीय मोर्चे को समर्थन दिया और 248 सांसदों के साथ 2 दिसम्बर 1989 को वीपी सिंह इस देश के आठवें प्रधानमंत्री बनें और चौधरी देवीलाल को उपप्रधानमंत्री बनाया गया।

प्रधानमंत्री के तौर पर वीपी सिंह एक औसत नेता थे। वे गरीबों के हित के लिये काम करते थे वहीं कडा निर्णय लेने से भी पीछे नही हटते थे। एक बार उन्होने लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया जबकि लाल कृष्ण आडवाणी उन्हे समर्थन देने वाली पार्टी भाजपा के बडे नेता थे। लेकिन वीपी सिंह के कार्यकाल में देश अस्थिरता की और बढ रहा था। देश को तीन प्रधानमंत्रियों की हत्या के बाद देश में दहशत का माहौल था। वीपी सिंह उस समय भारत को सफल राजनीति नही दे पाये। उनका कार्यकाल केवल 1 साल ही रहा। 10 नवम्बर 1990 में उन्होने इस्तीफा दे दिया।

वीपी सिंह एक लेखक के रूप में

वीपी सिंह जी राजनीति के साथ साथ साहित्य में भी रूचि रखते थे। उनकी कई रचनाऐ प्रकाशित हुईं।

• मुफ़लिस / विश्वनाथ प्रताप सिंह
• भगवान / विश्वनाथ प्रताप सिंह
• मैं और वक्त / विश्वनाथ प्रताप सिंह
• इश्तेहार / विश्वनाथ प्रताप सिंह
• क्षणिकाएँ / विश्वनाथ प्रताप सिंह

विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) का निधन

आखिरी समय में वीपी सिंह किडनी की तकलीफ से परेशान थे। 27 नवम्बर 2008 को 77 वर्ष की उम्र में वीपी सिंह का देहांत दिल्ली के अपोलो हॉस्पीटल में हो गया।