बहुत समय पहले की बात है एक राजा हुआ करता था। राजा बहुत ही समझदार हुआ करता था अगर उसके मन में कोई भी सवाल आये तो वो उसका जबाब ढूंढ कर ही मानता था। अगर उसे किसी भी सवाल का जबाब नही मिलता था तो वह परेशान हो जाया करता था। किसी भी काम में उसकी हार उसे बहुत विचलित कर देती थी, वह सोचता रहता था कि ऐसा क्या किया जाऐ कि वह कभी न हारे।

एक दिन राजा के मन में तीन सवाल उमडे जिनके जबाब पाने के लिये वो बैचेन हो गया। पहला सवाल था कि— किसी कार्य को करनें का सही समय कौन सा होता है, दूसरा सवाल था कि— किसकी बात सुननी चाहिये और किसे टालना चाहिये। राजा का तीसरा सवाल था कि — सबसे आवश्यक कार्य कौन सा है।

इन तीनों सवाल का जबाब जब राजा को नही मिला तो उसने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि जो भी उसके इन तीनों सवालों को जबाब दिया जाऐगा उसे भारी मात्रा में सोने, जवाहरात व धन मिलगा। राजा के घोषणा करनें की देर थी कि उसके राज्य में दूर—दूर से विद्वान आने लगे।

सभी विद्वानों के अपने अलग—अलग जबाब थे किसी का कहना था कि किसी कार्य को शुरू करनें से पहले सोच लेना चाहिये कि कार्य कितने समय में पूरा होगा या फिर कार्य करने का तरीका और समय ​तय करना चाहिये उसी के अनुसार कार्य करना चाहिये। वहीं कुछ लोगों का कहना ​था कि कार्य करने का समय तय करना कठिन हैं इसलिये बेकार के कार्यों में समय नष्ट करनें से बेहतर है कि जो कार्य आसपास हो रहा हो उसी काम मे लग जाऐं। कुछ लोगों का कहना था कि राजा को कार्य करने से पहले सलाहकारों से सलाह लेनी चाहिये।

राजा के तीनों सवालों के लोगों के पास अलग अलग जबाब थे, राजा उन में से किसी के भी जबाब से सन्तुष्ट नही हुआ। किसी ने राजा को बताया कि पास के जंगल में एक साधू रहते हैं वे राजा के सवालों के जबाब दे सकते हैं लेकिन वे सिर्फ साधारण लोगों से ही मिलते हैं। राजा ने उनसे मिलने का निश्चय किया।

दूसरे दिन राजा वेश बदलकर राजा जगंल की तरफ चल दिया। राजा को वहां पेडों के झुरमुट में साधू की झोपडी दिखाई दी। राजा जब साधू के पास पहुंचा तो देखा कि साधू झोपडी के सामने खोद रहे थे। साधू का शरीर बहुत दुबला पतला था वे कुदाल से खोदते समय वे जोर जोर से हांप रहे थे, राजा को देखकर साधू रूक गये। उन्होने राजा को देखकर अभिवादन किया फिर वे अपने काम मे लग गये। राजा ने साधू से कहा कि मैं आपके पास अपने ​तीन सवालों को लेकर आया हूं राजा ने अपने तीनो सवाल साधू को बातये। सवाल सुनकर साधू ने राजा को कोई जबाब ​नही दिया वे अपने काम में लगे रहे। राजा उन्हे देखता रहा कुछ देर बाद राजा का मन पसीजा और बोला कि आप रहने दीजिये मैं खोद देता हूं। साधू ने उसे कुदाल थमा दी और खुद जमीन पर बैठ गये और देखने लगे। एक घण्टा बीता, दो घण्टे बीते, धीरे—धीरे शाम हो गयी सूरज छिप गया। तब राजा ने कुदाल एक तरफ रखी और हाथ जोड कर साधू से पूंछा कि मैं आपके पास अपने सवाल पूंछने आया हूं अगर आपको उसका उत्तर नही पता ​तो आप मुझे मना कर ​दीजिये तो मैं वापस लौट जाऊंगा। इतना सुनकर भी साधू चुप रहे तभी वहां एक आदमी भागता हुआ आया उसके पेट से खून बह रहा था वो राजा के पास आकर कुछ बुदबुदाया और बेहोश हो गया। राजा और साधू ने मिलकर उसे भूमि पर लिटाया और उसकी घावों पर पट्टी बांधी। थोडी देर बाद वह आदमी होश में आया तो राजा ने उसे पानी पिलाया।

संध्या हो गई थी, ठण्डी हवा भी चल रही थी, बाहर लेटा हुआ आदमी ठण्ड से कांप उठा तो राजा और साधू ने मिलकर उसे अंदर झोपडी में लिटाया। राजा बहुत थक गया था और वो सो गया। जब वह सुबह उठा तो उसकी समझ मे नही आया कि लेटा हुआ बीमार आदमी कौन हैं, वह उसे एकटक देखता रहा।

वह आदमी उठा और राजा के कदमों मे गिर पडा और कहने लगा मुझे माफ कर दीजिये, मैं आपके शत्रु हूं आपने मेरे भाई को फांसी की सजा सुनाई थी तभी से मैं आपसे प्रतिशोध लेना चाहता था, जब मुझे पता चला कि आप अकेले साधू से मिलने आये हो तो मैं आपकी हत्या करने की नीयत से से यहां आया लेकिन आपके अंगरक्षकों ने मुझे पहचान लिया और उन्होने मुझे मारने की कोशिश की पर मैं उन से बच कर भाग आया, अगर आप मेरी पट्टी न करते तो मै मर जाता, आपने मेरी जान बचाई है अब मैं जीवन भर आपकी सेवा करूंगा।

राजा ये बात सुनकर बहुत खुश हुआ उसने कभी नही सोचा था कि शत्रु इतनी आसानी से मित्र बन सकता है। राजा ने उसे क्षमा कर दिया और उसको भरोसा दिलाया कि वह उसकी देखभाल का पूरा इंतेजाम करेगा।

राजा झोपडी से बाहर आया और साधू से पूंछा कि आपसे अंतिम बार अपने सवालों के जबाब मांग रहा हूूं। साधू उस समय घुटने के बल बैठे हुये क्यारियों में बीज बो रहे थे। साधू ने राजा से कहा किन राजन तुम्हे तुम्हारे सवालों का जबाब मिल चुका है। राजा कुछ समझा नहीं उसने साधू से कहा कि — मैं कुछ समझा नही।

साधू ने कहा अगर कल तुम्हारे मन मे दया न आई होती तो तुम चले गये होते और तुम ये क्यारियां तैयार करनें में मेरी मदद न करते। और रास्ते में ये आदमी तुम पर हमला करता। मेरे पास न रूकने के लिये तुम पछताते। जब तुम क्यारियां तैयार कर रहे थे, वही तुम्हारे लिये सबसे जरूरी काम था, और उस समय सबसे महत्वपूर्ण आदमी मैं था। उस समय मेरा काम सबसे जरूरी था। जब वह आदमी दौड कर हमारे पास आया तो हमने उसकी मरहम पट्टी की, वही सबसे सही समय था अगर उस समय तुम उसकी मरहम पट्टी न करते तो वह आदमी मर जाता। इसलिये उस समय सबसे महत्वपूर्ण आदमी वह व्यक्ति था। तुमने उसके लिये जो किया वह तुम्हारा सबसे जरूरी कार्य था।

याद रखना सबसे समय वही होता है जब हमारे पास किसी भी तरह की शक्ति होती है। सबसे महत्वपूर्ण आदमी वह होता है जिसके साथ हम होते हैं कोई नही जानता कब क्या हेगा। संकट में पडे व्यक्ति की सहायता करना ही सबसे जरूरी काम होता है। हमें जीवन इसलिये मिला है कि हम दूसरों के काम आऐं। यही जीवन की सफलता है। साधू का उत्तर पाकर राजा को सन्तोष हुआ, और राजा उन्हे आदर के साथ प्रणाम करके अपने महल की ओर चल पडा।