NPA क्या होता है। पूरी जानकारी

बैंकिंग सिस्टम से जुडे शब्द NPA को कम लोग ही जानते हैं। सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों का NPA 95 प्रतिशत तक पहुॅच गया है। बैंकिंग नियमों के हिसाब से जब किसी लोन की ईएमआई, प्रिंसिपल (मूल रकम) या इंटरेस्ट (ब्याज) ड्यू डेट के 90 दिन के भीतर नहीं आती है तो उसे NPA में डाल दिया जाता है। आइये जानते हैं कि NPA क्या होता है।

जानिये NPA क्या होता है

NPA की फुल फाॅर्म Non Performing Assets होता है। इसे हिन्दी में गैर निस्पंदकारी सम्पत्तियाॅ कहते हैं। अगर कोई भी व्यक्ति जो बैंक से लोन लेता है और तीन महीने तक उसका ब्याज या मूल रकम जमा नही करता है तो उसके खाते को NPA कहा जाता है। यानी उसके खाते में अब कोई भी हलचल नही होती है। बैंक ये मान लेती है कि उसका कर्ज डूब गया है और अब कर्ज आने की उम्मीद न के बराबर है।

किसी भी लोन को NPA घोषित करने की एक समय अवधि होती है। किसी भी लोन खाते पर 90 दिन या तीन माह से अधिक होने पर लोन का Premium या EMI जमा न हो तो इसे NPA घोषित कर दिया जाता है। सन 1993 यहाँ समय अवधि 12 माह थी। सन 1995 इस समय अवधि को घटा कर 6 माह कर दिया गया। सन 2014 में बड़ते एनपीए की चिंता को देखते हुए इस समय अवधि को 3 माह कर दिया गया।

NPA निम्नानुसार परिभाषित हैः-

अल्प अवधि के लिए फसल कृषि ऋण जैसे कि धान, ज्वार, बाजरा आदि के मामले में अगर 2 फसल सीजन के लिए ऋण (किस्त) का भुगतान नहीं किया गया है, तो इसे NPA माना जाएगा। वहीं लंबी अवधि की फसलों के लिए 1 फसल का मौसम बीत जाने के बाद तक अगर लोन की राशि का भुगतान नहीं हुआ है तो भी वह NPA कहलाएगा।

अगर आप का खाता NPA घोषित हो जाता है तो बैंक वाले आपके पास नोटिस भेजेंगे। अगर आप नोटिस के बाद भी पैसा नही देते हो तो आपने लोन के बदले जो कागज दिये होंगे उनके आधार पर आपकी सम्पत्ति जब्त कर ली जाऐगी।

लोन के कई क्लासिफिकेशन हैं- स्टैंडर्ड, सब-स्टैंडर्ड, डाउटफुल और लॉस एसेट। लोन पर डिफॉल्ट के चलते बैंकों पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़े, इसके लिए Reserve Bank of India ने उसके लिए प्रोविजन करने का नियम बनाया है। बैंक को प्रोविजन के बराबर की रकम बिजनेस से अलग रखनी पड़ती है।

स्टैंडर्ड अकाउंट या लोन क्या होता है?

अगर कर्जदार समय पर लोन का प्रीमीयम जमा करता रहता है, तो उसका लोन अकाउंट स्टैंडर्ड माना जाता है। Financial Security को देखते हुए बैंकिंग रेगुलेटर रिजर्ब बैंक आॅफ इण्डिया के बनाए नियमों के मुताबिक बैंकों को स्टैंडर्ड लोन के लिए भी प्रोविजन करना पड़ता है। स्टैंडर्ड लोन के लिए बैंकों को उसके 0.40 फीसदी के बराबर की रकम की प्रोविजनिंग करनी पड़ती है। कमर्शल रियल एस्टेट के मामले में यह 1 फीसदी जबकि छोटे उद्यमों के लिए 0.25 फीसदी है।

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सब-स्टैंडर्ड एसेट क्या होता है

जब कोई एसेट 12 महीने या कम समय तक NPA रहता है तो वह सब-स्टैंडर्ड एसेट कहलाता है। सब-स्टैंडर्ड लोन के लिए बैंक को बकाया रकम के 15 फीसदी के बराबर की प्रोविजनिंग करनी पड़ती है। जिस लोन पर कोई सिक्यूरिटी नहीं होती है उसमें बैंकों को 10 फीसदी अतिरिक्त की प्रोविजिनिंग करनी पड़ती है।

डाउटफुल एसेट क्या होते हैं

जब कोई एसेट 12 महीने तक सब-स्टैंडर्ड रहता है, तब वह डाउटफुल एसेट की कैटिगरी में आ जाता है। ऐसे लोन के समूचे बकाया रकम की वसूली की संभावना बहुत कम होती है। अगर कोई लोन एक साल तक डाउटफुल रहता है, तो उसकी 25 फीसदी प्रोविजनिंग होगी, तीन साल तक साल तक डाउटफुल रहने पर 40 फीसदी और तीन साल बाद 100 फीसदी प्रोविजनिंग करनी होगी।

लॉस एसेट क्या होता है

बैंक को जब ये लगने लगता है कि अब किसी लोन अकाउण्ट के वैल्यू बहुत कम रह गई या खत्म हो गयी है एसे खाते को राइट आॅफ कर दिया जाता है। देनदार के बकाया इंटरेस्ट और प्रिंसिपल का भुगतान होने पर एनपीए स्टैंडर्ड लोन कैटिगरी में डाला जा सकता है। एनपीए को स्टैंडर्ड कैटिगरी में ट्रांसफर करने के लिए बैंक अक्सर देनदार को बकाया भुगतान के लिए ज्यादा वक्त देकर और इंटरेस्ट रेट घटाकर लोन को रीस्ट्रक्चर कर देते हैं।